बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

भारत की शिक्षा व्यवस्था के अंधेरे गलियारों में आखिर रेंगता क्या है? सपने? महत्वाकांक्षाएं? उम्मीदें? या फिर कुछ और? आधी रात को मेज पर झुका एक टीनएजर। लाल आंखें। थका हुआ शरीर। सामने बिखरे टेस्ट पेपर। दूसरी ओर माता-पिता, जो कोचिंग की फीस भरने के लिए कर्ज़ और कुर्बानियों का हिसाब लगा रहे हैं।

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बेंगलुरु आज आईटी क्षेत्र में प्रगति के शिखर पर है। इसमें पूरे भारत से आए प्रतिभाशाली युवाओं का बड़ा योगदान है, सिर्फ स्थानीय लोगों का नहीं...

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भारत में भाषा केवल बोली नहीं जाती है बल्कि यह यहां छाती ठोककर चलती है। झंडा बन जाती है। राजनीति बन जाती है और कभी-कभी बारूद भी।

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28 वर्षीय युवक, उदय नाथ पीठ पर भारी बैग लटकाए ट्रैफिक चीरता भाग रहा है। बिहार से आया रमेश चौधरी चार मंज़िल सीढ़ियाँ चढ़कर राशन का सामान पहुंचा रहा है। उधर, हलवाई की दुकान के बाहर बाबू लाल मोबाइल स्क्रीन पर टकटकी लगाए अगले ऑर्डर का इंतज़ार कर रहा है। मोतियाबिंदी अर्थशास्त्री इसे ‘स्टार्टअप क्रांति’ कहते हैं। लेकिन, क्या यह सचमुच क्रांति है? या फिर पुरानी सामंती व्यवस्था का नया डिजिटल संस्करण...

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एक पुराना किस्सा आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था का आईना लगता है। स्कूल इंस्पेक्टर अचानक क्लास में पहुंचा। मास्टरजी बच्चों को ‘गर्ल’ की स्पेलिंग पढ़ा रहे थे ‘ग्रिल्ड, “बोलो… ग्रिल्ड।” इंस्पेक्टर भड़क गया, “ये क्या पढ़ा रहे हो?” मास्टरजी ने भी तल्ख़ी से जवाब दिया, “तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली। जब तक वेतन नहीं मिलेगा, ‘गर्ल’ को ‘ग्रिल्ड’ ही पढ़ाऊंगा।...

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आख़िर इंसान को कामयाब क्या बनाता है? एयर कंडीशन्ड स्मार्ट क्लासरूम, विदेशी सिलेबस और चमकदार कैंपस? या फिर संघर्ष, मेहनत, भूख और आगे बढ़ने का जुनून?

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