बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

28 वर्षीय युवक, उदय नाथ पीठ पर भारी बैग लटकाए ट्रैफिक चीरता भाग रहा है। बिहार से आया रमेश चौधरी चार मंज़िल सीढ़ियाँ चढ़कर राशन का सामान पहुंचा रहा है। उधर, हलवाई की दुकान के बाहर बाबू लाल मोबाइल स्क्रीन पर टकटकी लगाए अगले ऑर्डर का इंतज़ार कर रहा है। मोतियाबिंदी अर्थशास्त्री इसे ‘स्टार्टअप क्रांति’ कहते हैं। लेकिन, क्या यह सचमुच क्रांति है? या फिर पुरानी सामंती व्यवस्था का नया डिजिटल संस्करण...

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एक पुराना किस्सा आज भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था का आईना लगता है। स्कूल इंस्पेक्टर अचानक क्लास में पहुंचा। मास्टरजी बच्चों को ‘गर्ल’ की स्पेलिंग पढ़ा रहे थे ‘ग्रिल्ड, “बोलो… ग्रिल्ड।” इंस्पेक्टर भड़क गया, “ये क्या पढ़ा रहे हो?” मास्टरजी ने भी तल्ख़ी से जवाब दिया, “तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली। जब तक वेतन नहीं मिलेगा, ‘गर्ल’ को ‘ग्रिल्ड’ ही पढ़ाऊंगा।...

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आख़िर इंसान को कामयाब क्या बनाता है? एयर कंडीशन्ड स्मार्ट क्लासरूम, विदेशी सिलेबस और चमकदार कैंपस? या फिर संघर्ष, मेहनत, भूख और आगे बढ़ने का जुनून?

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नई इमारत तैयार है। चमचमाता बोर्ड लग गया है। रंगीन ब्रोशर छप चुके हैं। ‘एडमिशन शुरू हैं!’ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी। मशीन लर्निंग। रोबोटिक्स। नाम सुनकर लगता है, बस दाखिला लो और भविष्य जेब में डाल लो। मगर कई कॉलेजों के भीतर जाइए। खाली कुर्सियां आपका स्वागत करती मिलेंगी। यही भारतीय उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी विडम्बना है...

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लोकतंत्र में जब नया खून नहीं आता है, तो पुरानी नसों में जंग लगने लगती है। वही चेहरे, वही नारे, वही वादे और वही कुर्सी की दौड़। देश की राजनीति आज कुछ ऐसी ही थकी हुई दिखाई देती है...

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साल 1964-65 में मेरे माता-पिता आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज की मासिक फीस सिर्फ छह से 10 रुपये भरते थे। स्कूल की यूनिफॉर्म साधारण सूती खाकी होती थी और इसके अलावा कोई छिपा हुआ खर्च नहीं था...

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