बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

आज के भारत में अगर किसी बेरोजगार युवक से पूछो कि “क्या कर रहे हो?”, तो ज्यादातर जवाब आता है — “आईएएस की तैयारी कर रहा हूं।” जैसे दुनिया में समाज सेवा करने का बस एक ही रास्ता बचा है — कलेक्टर बनो!। राजधानी दिल्ली के कुछ इलाकों में ऐसे ‘उड़ान’ के सपने देखने वाले युवाओं और कोचिंग सेंटर, फोटो कॉपिंग शॉप की भरमार है। हॉल ही में एक फिल्म भी इसी विषय पर पुरस्कृत हुई है...

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आगरा से लेकर लखनऊ, चेन्नई, केरल के शिक्षक कक्षाओं से बाहर निकलकर सड़कों पर मोर्चा लगाने को मजबूर हैं। सुप्रीम कोर्ट के टीईटी अनिवार्यता के आदेश के विरोध में शिक्षक संगठन लामबंद हो रहे हैं।

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चॉक की सफेद धूल से लेकर चैटजीपीटी की डिजिटल चमक तक—शिक्षा का सफर किसी जादू से कम नहीं है। कभी ब्लैकबोर्ड पर उकेरे अक्षरों में सपने संवरे, आज स्मार्टबोर्ड और एआई की दुनिया में वही सपने नए पंख पा रहे हैं...

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उत्तर प्रदेश में तकनीकी शिक्षा की तस्वीर लंबे समय से चिंताजनक रही है। राज्य के पॉलिटेक्निक और इंजीनियरिंग कॉलेजों में आधुनिक प्रयोगशालाओं व उपकरणों की कमी और कमजोर प्रशिक्षण स्तर के कारण डिग्री-डिप्लोमा धारक युवा उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप कौशल हासिल नहीं कर पाते हैं।

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भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था विराट तो है, पर इसकी नींव कमजोर है। शिक्षा के लिए सकल घरेलू उत्पाद का मात्र तीन फीसदी हिस्सा आवंटित होने से विश्वविद्यालय संसाधनों की कमी और भीड़भाड़ से जूझ रहे हैं...

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तमाम रिपोर्ट बार-बार चीख-चीख कर कह रही है कि आठवीं क्लास के बच्चे तीसरी की किताब भी नहीं पढ़ पाते। सरकारी स्कूलों में शिक्षक तो हैं, पर पढ़ाने की लगन नहीं। निजी स्कूलों में फीस है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का घोर अभाव। पाठ्यक्रम रटंत विद्या को बढ़ावा देते हैं, सोचने-समझने की क्षमता को कुचलते हैं...

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