जब से यूनिवर्सिटी कैंपस शांत और बेजान हुए हैं, देश की राजनीति को नए युवा नेतृत्व का सूखा पड़ गया है। छात्र संघ चुनाव या तो बंद हो चुके हैं या महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं। लखनऊ, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना, गोरखपुर जैसे पारंपरिक विचार-केंद्रों के विश्वविद्यालयों में अब बहसों की गूंज नहीं सुनाई देती। दिल्ली यूनिवर्सिटी का जोश ठंडा पड़ा है, और जेएनयू अपनी विचारधारात्मक लड़ाई हार चुका है। वामपंथ बूढ़ा होकर इतिहास के पन्नों में सिमट रहा है, जबकि लोहियावादी नकली समाजवादियों के पिछलग्गू बन गए हैं। संपूर्ण क्रांति के नायक अब मोह-माया के गलियारों में भटक रहे हैं।
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