बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

जबसे स्कूलों में बच्चों की पिटाई बंद करने का फरमान जारी हुआ है, तबसे मास्साब का रुतबा और खौफ उड़नछू हो गया है। घर में पेरेंट्स परेशान, स्कूलों में अध्यापक, अनुशासन, शिष्टाचार, अदब कायदे सब पश्चिमी सोच की लहर में बह गए हैं। भय बिन प्रीत या सम्मान कब, कहां किसको मिलता है। राऊडी स्टूडेंट्स को पनिशमेंट मिलना ही चाहिए, कैसा और कितना, इस पर बहस हो सकती है...

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आजकल हिंदू मंदिर और तिरुपति का लड्डू प्रसाद चर्चा में हैं। कुशल प्रबंधन के अभाव में तीर्थ यात्रियों और नियमित भक्तों को तमाम तरह की परेशानियों और बाधाओं से जूझना पड़ता है। कई हादसे भी होते रहते हैं। ऐसे में मंदिर जाने के अनुभवों को यादगार क्षण कैसे बनाया जाए, कैसे व्यवस्थाएं दुरुस्त हों, कैसे आर्थिक पारदर्शिता आए और कैसे साधनों का बेहतर उपयोग हो, इन विषयों को लेकर एक नया पाठ्यक्रम शुरू किया गया है...

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भारतीय शिक्षा प्रणाली में जबर्दस्त मात्रात्मक वृद्धि के बावजूद, देश की वर्तमान शैक्षिक व्यवस्था आम जनता के लिए अपर्याप्त बनी हुई है। मौजूदा व्यवस्था देश के सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों और मनोवृत्तिगत लक्षणों को आधुनिक बनाने के लिए उच्चस्तरीय स्नातकों का निर्माण करने में विफल रही है। विश्वविद्यालयों, मेडिकल कॉलेजों और उच्च शिक्षा के संस्थानों के प्रसार ने बेहतर शिक्षण और अनुसंधान में तब्दील नहीं किया है। इससे भारत का शिक्षा क्षेत्र लाचार और चिंताजनक स्थिति में है।

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भारत की शिक्षा प्रणाली गहरे संकट में है। रटने की आदत, आलोचनात्मक सोच की कमी और परीक्षा-केंद्रित संस्कृति ने शिक्षा को खोखला बना कर रख दिया है।

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