कल्पना नहीं, हक़ीक़त देखिए। एक ही गली के मोड़ पर दो बच्चे खड़े हैं। उम्र बराबर, सपने बराबर। फर्क बस इतना है कि एक चमचमाते प्राइवेट स्कूल से निकलता है, स्मार्ट बोर्ड की रोशनी आंखों में, एसी की ठंडक बदन में, अंग्रेज़ी की धार आत्मविश्वास में। दूसरा सरकारी स्कूल से, टपकती छत से बचता, भीड़भाड़ वाले शौचालय से जूझता, मासिक धर्म की शर्म और असुविधा को चुपचाप ढोता हुआ...
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