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नई श्रम संहिताओं से महिलाओं को मिलेगी अधिक सुरक्षा और समानता


महिलाएं भारत के कार्यबल का एक अहम और लगातार बढ़ता हुआ हिस्सा हैं, और नई श्रम संहिताएं उनके लिए एक अधिक समावेशी, सुरक्षित और सक्षम कार्य वातावरण बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।

समानता, मातृत्व लाभ, कार्यस्थल पर सुरक्षा और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में प्रतिनिधित्व पर प्रगतिशील प्रावधानों के साथ, ये संहिताएं आज की अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए श्रम नियमों का आधुनिकीकरण करती हैं। ये सुधार न केवल महिला श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं, बल्कि समान व्यवहार सुनिश्चित करके और रात्रि पाली तथा खतरनाक उद्योगों सहित सभी क्षेत्रों में उनकी भागीदारी का समर्थन करके अवसरों का विस्तार भी करते हैं। ये उपाय मिलकर महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को मज़बूत करते हैं और एक अधिक सशक्त और लैंगिक-संतुलित श्रम व्यवस्था के निर्माण में योगदान करते हैं।

औद्योगिक संबंध संहिता 2020, शिकायत निवारण समिति में महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व अनिवार्य करती है, जो प्रतिष्ठान के कुल कार्यबल में उनके अनुपात से कम नहीं होना चाहिए। यह सुनिश्चित करता है कि कार्यस्थल विवाद समाधान में महिला कर्मचारियों का निष्पक्ष प्रतिनिधित्व हो। यह महिलाओं का नज़रिया मुद्दों को अधिक व्यापक और संवेदनशील तरीके से संबोधित करने में मदद करता है।

सहकर्मियों द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने पर महिला कर्मचारी अपनी चिंताओं को व्यक्त करने में अधिक सुरक्षित महसूस करती हैं। कार्यस्थल पर उत्पीड़न, मातृत्व अधिकार और सुरक्षा जैसे मामलों को बेहतर ढंग से संभाला जा सकता है। संतुलित प्रतिनिधित्व निष्पक्षता को बढ़ावा देता है, भेदभाव और संघर्षों को कम करता है।

सामाजिक सुरक्षा संहिता के अनुसार, मातृत्व लाभ के लिए पात्र होने के लिए, एक महिला को अपेक्षित प्रसव से ठीक पहले के 12 महीनों में कम से कम 80 दिन किसी प्रतिष्ठान में काम करना ज़रूरी है। पात्र महिलाओं को अवकाश की अवधि के लिए उनकी औसत दैनिक मजदूरी के बराबर मातृत्व लाभ मिलता है। मातृत्व अवकाश की अधिकतम अवधि 26 सप्ताह है, जिसमें से अधिकतम आठ सप्ताह का अवकाश प्रसव की अपेक्षित तिथि से पहले लिया जा सकता है। इसके अलावा, कोई महिला जो कानूनी रूप से तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती है, या एक ‘कमीशनिंग मदर’ यानी, एक बायोलॉजिकल मां, जो सरोगेसी की मदद लेती है, गोद लेने की तारीख से या बच्चे को सौंपे जाने की तारीख से 12 सप्ताह के मातृत्व लाभ की हकदार है।

यदि किसी महिला को इस तरह का कार्य सौंपा गया है, जो वह घर से कर सकती है, तो नियोक्ता उसे मातृत्व लाभ प्राप्त करने के बाद, ऐसी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों पर, जिन पर नियोक्ता और महिला आपसी सहमति से सहमत हों, ऐसा करने की अनुमति दे सकता है। सामाजिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत यह प्रावधान, प्रमाणीकरण प्रक्रिया को सरल बनाता है, जो मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के तहत केवल एक पंजीकृत चिकित्सक, अस्पताल या दाई से ही प्राप्त की जा सकती है।

यदि नियोक्ता नि:शुल्क प्रसव पूर्व प्रसवोत्तर देखभाल प्रदान नहीं करता है, तो महिला 3,500 रुपये के चिकित्सा बोनस की हकदार है। प्रसव के बाद ड्यूटी पर लौटने पर, एक महिला अपने दैनिक कार्य के दौरान बच्चे की देखभाल के लिए दो ब्रेक की हकदार होती है, जब तक कि बच्चा 15 महीने का न हो जाए।

प्रत्येक प्रतिष्ठान में जहां 50 या अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, एक निर्धारित दूरी के भीतर एक अलग या सामूहिक शिशुगृह की सुविधा होनी चाहिए। नियोक्ता को महिला को शिशुगृह में प्रतिदिन चार बार जाने की अनुमति देनी चाहिए, जिसमें विश्राम के अंतराल भी शामिल हैं।

सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियों पर संहिता, 2020 के तहत यह प्रावधान छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों वाली कामकाजी महिलाओं का समर्थन करता है। शिशुगृह सुविधाएं कार्यस्थल पर बच्चों की देखभाल को सक्षम बनाकर कामकाजी माताओं को मदद प्रदान करती हैं, जिससे महिलाओं को काम और परिवार के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलती है।

महिला श्रमिक सभी प्रकार के कार्यों के लिए सभी प्रतिष्ठानों में काम कर सकती हैं। वे अपनी सहमति से रात में भी काम कर सकती हैं, अर्थात सुबह छह बजे से पहले और शाम सात बजे के बाद और नियोक्ता को उनकी सुरक्षा, सुविधाओं और परिवहन के लिए पर्याप्त व्यवस्था करनी होगी।

महिलाओं को ज़रूरी सुरक्षा उपायों के साथ रात की शिफ्ट सहित सभी प्रतिष्ठानों में काम करने की अनुमति देने से लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलता है, रोज़गार के अवसरों का विस्तार होता है और कार्यबल में महिलाओं की अधिक भागीदारी को समर्थन मिलता है।

नियोक्ता, कर्मचारियों द्वारा किए गए समान कार्य या समान प्रकृति के कार्य के संबंध में भर्ती, वेतन या रोज़गार की शर्तों से जुड़े मामलों में लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे। वेतन संहिता, 2019 के अंतर्गत समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करता है, लिंग के आधार पर अनुचित वेतन असमानताओं को खत्म करता है।

सुरक्षा का विस्तार केवल वेतन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भर्ती और रोज़गार की स्थितियों को भी शामिल करता है, जिससे पूरे रोज़गार में निष्पक्षता सुनिश्चित होती है। कार्यस्थल पर समानता को बढ़ावा देता है, महिलाओं और पुरुषों को नियुक्ति, वेतन और व्यवहार में समान अवसर प्रदान करता है।

केंद्रीय व राज्य सलाहकार बोर्ड में एक-तिहाई सदस्य महिलाएं होंगी। बोर्ड न्यूनतम वेतन के निर्धारण या संशोधन, महिलाओं के लिए रोज़गार के अवसरों में वृद्धि, और ऐसे प्रतिष्ठानों या रोज़गारों में महिलाओं की नियुक्ति की सीमा पर सलाह देगा। इससे नीति-निर्माण में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सकेगा, जिससे अधिक समावेशी और संतुलित रोज़गार नीतियां बनती हैं। यह ऐसी नीतियां बनाने में भी मदद करता है, जो महिलाओं के लिए रोज़गार के अवसरों को बढ़ाती हैं और श्रम बाज़ार में लैंगिक समानता को बढ़ावा देती हैं।

कुल मिलाकर, नई श्रम संहिताओं के प्रगतिशील प्रावधान लैंगिक समानता लाकर सभी प्रतिष्ठानों में समानता और सुरक्षा सुनिश्चित करके महिला कार्यबल को सामूहिक रूप से मज़बूत बनाते हैं। समान कार्य के लिए समान वेतन, मातृत्व लाभ में वृद्धि, शिशु-गृह सुविधा और भर्ती में भेदभाव न करने जैसे प्रावधानों के ज़रिए, ये संहिताएं महिलाओं को पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ खतरनाक उद्योगों और रात की शिफ्ट सहित सभी क्षेत्रों में काम करने की अनुमति देकर, महिलाओं की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित करेंगी।

शिकायत निवारण में महिलाओं का बढ़ता प्रतिनिधित्व भी उनके हितों की रक्षा करेगा। ये सुधार महिलाओं के लिए एक अधिक समावेशी, सुरक्षित और सशक्त कार्य वातावरण का निर्माण करते हैं, ताकि वे भारत के आर्थिक विकास में आत्मविश्वास के साथ योगदान दे सकें।



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