आगरा की एक हाउसिंग सोसायटी की सीढ़ियां चढ़ती रामवती आज कुछ ज़्यादा ही थकी हुई थी। उसके हाथों में झाड़ू-पोंछा था, लेकिन मन पर एक और बड़ा बोझ, सरकार के नए लेबर कोड का डर...
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बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।
आगरा की एक हाउसिंग सोसायटी की सीढ़ियां चढ़ती रामवती आज कुछ ज़्यादा ही थकी हुई थी। उसके हाथों में झाड़ू-पोंछा था, लेकिन मन पर एक और बड़ा बोझ, सरकार के नए लेबर कोड का डर...
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बिहार के एक छोटे से गांव की धूलभरी गलियों में 19 वर्षीय रामवती कभी ‘अछूत’ कहलाती थी। कुएं से पानी भरने जाओ तो औरतें पीछे हट जाती थीं। उसकी परछाईं तक मनहूस मानी जाती थी। मगर, ग्रेजुएशन के बाद, अंग्रेजी भाषा सीखकर आज, गुरुग्राम के एक कॉल सेंटर में बैठी वही रामवती अपनी आवाज़ से महाद्वीपों के पार ग्राहकों से बात करती है। यहां कोई उसकी जाति नहीं पूछता। उसकी क़ीमत उसकी बोलने की रफ़्तार, विनम्रता और काम के प्रति लगन से तय होती है।
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आज के भारत में अगर किसी बेरोजगार युवक से पूछो कि “क्या कर रहे हो?”, तो ज्यादातर जवाब आता है — “आईएएस की तैयारी कर रहा हूं।” जैसे दुनिया में समाज सेवा करने का बस एक ही रास्ता बचा है — कलेक्टर बनो!। राजधानी दिल्ली के कुछ इलाकों में ऐसे ‘उड़ान’ के सपने देखने वाले युवाओं और कोचिंग सेंटर, फोटो कॉपिंग शॉप की भरमार है। हॉल ही में एक फिल्म भी इसी विषय पर पुरस्कृत हुई है...
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आगरा से लेकर लखनऊ, चेन्नई, केरल के शिक्षक कक्षाओं से बाहर निकलकर सड़कों पर मोर्चा लगाने को मजबूर हैं। सुप्रीम कोर्ट के टीईटी अनिवार्यता के आदेश के विरोध में शिक्षक संगठन लामबंद हो रहे हैं।
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चॉक की सफेद धूल से लेकर चैटजीपीटी की डिजिटल चमक तक—शिक्षा का सफर किसी जादू से कम नहीं है। कभी ब्लैकबोर्ड पर उकेरे अक्षरों में सपने संवरे, आज स्मार्टबोर्ड और एआई की दुनिया में वही सपने नए पंख पा रहे हैं...
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उत्तर प्रदेश में तकनीकी शिक्षा की तस्वीर लंबे समय से चिंताजनक रही है। राज्य के पॉलिटेक्निक और इंजीनियरिंग कॉलेजों में आधुनिक प्रयोगशालाओं व उपकरणों की कमी और कमजोर प्रशिक्षण स्तर के कारण डिग्री-डिप्लोमा धारक युवा उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप कौशल हासिल नहीं कर पाते हैं।
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