क्या भारतीय उच्च शिक्षा सच में ‘उच्च’ बनेगी, या फिर ठहरी हुई सोच, राजनीतिक दखल और निहित स्वार्थों की जंजीरों में जकड़ी रह जाएगी? यही असली सवाल है। बाकी सब शोर शराबा है...
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बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।
क्या भारतीय उच्च शिक्षा सच में ‘उच्च’ बनेगी, या फिर ठहरी हुई सोच, राजनीतिक दखल और निहित स्वार्थों की जंजीरों में जकड़ी रह जाएगी? यही असली सवाल है। बाकी सब शोर शराबा है...
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सुबह की पहली किरणें अभी आंखें मल रही होती हैं, लेकिन सुभाष की दौड़ पहले ही शुरू हो चुकी होती है। एक हाथ में कोचिंग की मोटी-मोटी किताबें लटक रही हैं, दूसरे में स्कूल का पुराना बैग लटका है, और कंधों पर तो पूरे खानदान की आशाओं का पहाड़ सवार है...
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आगरा की एक हाउसिंग सोसायटी की सीढ़ियां चढ़ती रामवती आज कुछ ज़्यादा ही थकी हुई थी। उसके हाथों में झाड़ू-पोंछा था, लेकिन मन पर एक और बड़ा बोझ, सरकार के नए लेबर कोड का डर...
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बिहार के एक छोटे से गांव की धूलभरी गलियों में 19 वर्षीय रामवती कभी ‘अछूत’ कहलाती थी। कुएं से पानी भरने जाओ तो औरतें पीछे हट जाती थीं। उसकी परछाईं तक मनहूस मानी जाती थी। मगर, ग्रेजुएशन के बाद, अंग्रेजी भाषा सीखकर आज, गुरुग्राम के एक कॉल सेंटर में बैठी वही रामवती अपनी आवाज़ से महाद्वीपों के पार ग्राहकों से बात करती है। यहां कोई उसकी जाति नहीं पूछता। उसकी क़ीमत उसकी बोलने की रफ़्तार, विनम्रता और काम के प्रति लगन से तय होती है।
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आज के भारत में अगर किसी बेरोजगार युवक से पूछो कि “क्या कर रहे हो?”, तो ज्यादातर जवाब आता है — “आईएएस की तैयारी कर रहा हूं।” जैसे दुनिया में समाज सेवा करने का बस एक ही रास्ता बचा है — कलेक्टर बनो!। राजधानी दिल्ली के कुछ इलाकों में ऐसे ‘उड़ान’ के सपने देखने वाले युवाओं और कोचिंग सेंटर, फोटो कॉपिंग शॉप की भरमार है। हॉल ही में एक फिल्म भी इसी विषय पर पुरस्कृत हुई है...
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आगरा से लेकर लखनऊ, चेन्नई, केरल के शिक्षक कक्षाओं से बाहर निकलकर सड़कों पर मोर्चा लगाने को मजबूर हैं। सुप्रीम कोर्ट के टीईटी अनिवार्यता के आदेश के विरोध में शिक्षक संगठन लामबंद हो रहे हैं।
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