क्या भारतीय उच्च शिक्षा सच में ‘उच्च’ बनेगी, या फिर ठहरी हुई सोच, राजनीतिक दखल और निहित स्वार्थों की जंजीरों में जकड़ी रह जाएगी? यही असली सवाल है। बाकी सब शोर शराबा है।
कभी भारत में विश्वविद्यालय विचारों के मंदिर माने जाते थे। बहसें होती थीं, असहमति का सम्मान था, प्रयोग होते थे, और भविष्य के सपने बुने जाते थे। आज तस्वीर बदली हुई है। देश के अधिकांश कैंपस फाइलों, अनुमतियों, सिफारिशों और भय के बोझ तले दबे हैं। शिक्षा पीछे छूट गई है, व्यवस्था आगे आ खड़ी हुई है।
Read in English: Breaking the ice in Indian Higher Education…
आंकड़े इस सच्चाई को और नंगा करते हैं। भारत में आज करीब 1,100 से अधिक विश्वविद्यालय, 45 हजार से ज्यादा कॉलेज और लगभग चार करोड़ छात्र उच्च शिक्षा से जुड़े हैं। यह दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणालियों में से एक है। लेकिन, गुणवत्ता के मामले में हम अब भी पिछड़ते हैं। क्यूएस और टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग में भारत के गिने-चुने विश्वविद्यालय ही शीर्ष 200 या 300 में जगह बना पाते हैं।
सबसे गंभीर समस्या नेतृत्व की है। बीते दस वर्षों में देश के अलग-अलग राज्यों में कम से कम 30 से 35 कुलपति भ्रष्टाचार, अनियमित नियुक्तियों, फर्जी डिग्रियों, वित्तीय गड़बड़ियों या राजनीतिक संरक्षण के आरोपों में फंसे रहे हैं। कहीं जांच चल रही है, कहीं मुकदमे, तो कहीं चुप्पी। कुलपति योग्यता से नहीं, नजदीकी से चुने जाते हैं। विद्वता कम, वफादारी ज्यादा मायने रखती है। विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र कम, सत्ता के उपकेंद्र ज्यादा बनते जा रहे हैं।
पाठ्यक्रमों की हालत भी बेहतर नहीं। कई विश्वविद्यालयों में आज भी 20-25 साल पुराने पाठ्यक्रम पढ़ाए जा रहे हैं। पढ़ाने के तरीके बदले नहीं हैं और शोध अक्सर कागजी औपचारिकता बन गया है। हर साल लाखों छात्र डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन उद्योग जगत का साफ कहना है कि 40-50 प्रतिशत स्नातक “एम्प्लॉयबल” नहीं हैं। नौकरी नहीं मिलती तो हताशा बढ़ती है, और दोष किस पर जाए, यह तय नहीं हो पाता।
नियमन यानी रेगुलेशन ने सुधार कम, उलझन ज्यादा पैदा की। यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई, तीनों के अपने नियम, अपनी सीमाएं, अपनी फाइलें। एक ही कोर्स के लिए कई दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं। अनुमति मिलते-मिलते साल निकल जाते हैं। नए विचार, नए कोर्स, नए विश्वविद्यालय रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
राज्य विश्वविद्यालयों की हालत सबसे खराब है। देश के करीब 70 प्रतिशत छात्र इन्हीं में पढ़ते हैं। लेकिन, यहां शिक्षकों के हजारों पद खाली हैं। कई विश्वविद्यालयों में 30 से 40 प्रतिशत तक फैकल्टी की कमी है। इमारतें जर्जर हैं, लाइब्रेरी पुरानी, लैब सिर्फ निरीक्षण के समय चमकती हैं। फिर भी उम्मीद का सारा बोझ इन्हीं पर है।
इसी पृष्ठभूमि में आया है विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025। बड़ा नाम है, और मंशा भी बड़ी बताई जा रही है। लक्ष्य है, 2047 तक विकसित भारत के सपने को शिक्षा से जोड़ना। यह विधेयक यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई को समाप्त कर एक नया शीर्ष निकाय बनाने का प्रस्ताव करता है। इसके तहत तीन परिषदें होंगी। पहली, नियमन परिषद, जो नियम लागू करेगी। दूसरी, गुणवत्ता परिषद, जो मान्यता देगी तथा तीसरी, मानक परिषद, जो शिक्षा के स्तर तय करेगी।
सरल शब्दों में, एक ढांचा, एक दिशा, एक जवाबदेही। उद्देश्य है, अनावश्यक लालफीताशाही खत्म करना, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को ज्यादा स्वायत्तता देना, बहु-विषयक शिक्षा को बढ़ावा देना और शोध व नवाचार को गति देना। यह पूरी तरह नई शिक्षा नीति 2020 की सोच के अनुरूप बताया जा रहा है।
लेकिन, हर बड़े सुधार की तरह इसका विरोध भी तेज है। राज्य सरकारें अपने अधिकारों को लेकर चिंतित हैं। विश्वविद्यालय स्वायत्तता पर सवाल उठा रहे हैं। डर है कि सब कुछ दिल्ली से तय होगा, और राज्यों की भूमिका घट जाएगी। यह चिंता पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं है। शिक्षा संविधान में साझा विषय है। केरल, बस्तर और लद्दाख की शैक्षणिक जरूरतें एक जैसी नहीं हो सकतीं।
पर एक सच्चाई यह भी है कि कई राज्यों ने स्वायत्तता का इस्तेमाल सुधार के लिए नहीं, सियासी कब्जे के लिए किया। कुलपतियों की नियुक्तियां राजनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा बनीं। कैंपस विचारों के नहीं, गुटों के अखाड़े बन गए। अकादमिक आजादी सबसे पहले कुचली गई।
यह विधेयक उसी आरामदायक, जमी हुई व्यवस्था को चुनौती देता है। इसलिए विरोध सबसे ज्यादा वहीं है, जहां विश्वविद्यालय सत्ता के औजार बन चुके हैं। सरकार ने फिलहाल इसे संयुक्त संसदीय समिति को भेजकर संतुलन बनाने का संकेत दिया है। अब सवाल है, क्या सुधार और संघीय ढांचे के बीच सही रास्ता निकलेगा? क्या केंद्र नियंत्रण के मोह से बचेगा? क्या राज्य अपनी राजनीतिक पकड़ छोड़ने को तैयार होंगे?
असल में, यह विधेयक और साहसी हो सकता था। चिकित्सा, प्रबंधन, कानून और लेखा जैसे पेशेवर क्षेत्रों में भी गंभीर गड़बड़ियां हैं, फीस की लूट, मानकों की कमी, और गुणवत्ता पर सवाल। अधूरे सुधार भविष्य में नई उलझनें पैदा कर सकते हैं।
भारत के करोड़ों युवा इंतजार नहीं कर सकते। उन्हें ऐसी शिक्षा चाहिए जो उन्हें वैश्विक दुनिया से जोड़े, न कि पुराने सिलेबस में कैद रखे। उन्हें ऐसे शिक्षक चाहिए जो सवाल पूछने की हिम्मत दें, डर नहीं।
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025, अपनी खामियों के बावजूद, इरादे का संकेत है। दशकों बाद उच्च शिक्षा में बड़े बदलाव की कोशिश दिखती है। अब सब कुछ लागू करने के तरीके पर निर्भर है, संतुलन, पारदर्शिता और ईमानदार राजनीतिक इच्छाशक्ति पर।
भारतीय उच्च शिक्षा आज दो रास्तों पर खड़ी है। एक रास्ता वैश्विक स्तर का है। दूसरा, जमी हुई हालत का। चुनाव हमें करना है। अतीत से चिपके रहें, या भविष्य की ओर छलांग लगाएं।
इतिहास देरी को माफ नहीं करता।






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