कल्पना नहीं, हक़ीक़त देखिए। एक ही गली के मोड़ पर दो बच्चे खड़े हैं। उम्र बराबर, सपने बराबर। फर्क बस इतना है कि एक चमचमाते प्राइवेट स्कूल से निकलता है, स्मार्ट बोर्ड की रोशनी आंखों में, एसी की ठंडक बदन में, अंग्रेज़ी की धार आत्मविश्वास में। दूसरा सरकारी स्कूल से, टपकती छत से बचता, भीड़भाड़ वाले शौचालय से जूझता, मासिक धर्म की शर्म और असुविधा को चुपचाप ढोता हुआ।
दोनों बच्चे नहीं, दो भारत हैं। एक राजकुमार, दूसरा ग़ुलाम। यही है हमारे स्कूलों का “शैक्षणिक अपार्थीड”, बिना क़ानून लिखे, मगर पूरी सख़्ती से लागू। अंग्रेजी में पढ़ें : A small step toward equal classrooms…
जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने इसी ज़ुल्म पर तलवार चलाई है। कोर्ट ने साफ़ कहा कि मासिक धर्म कोई शर्म नहीं है बल्कि मौलिक अधिकार का मामला है। हर स्कूल में लड़कियों के लिए मुफ़्त सेनेटरी पैड और अलग, सुरक्षित शौचालय अनिवार्य होंगे। साथ ही, निजी स्कूलों में कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों के लिए 25 फीसदी आरक्षण को सख़्ती से लागू करने का फ़रमान भी जारी किया। यह सिर्फ़ आदेश नहीं, बल्कि लाखों माता-पिताओं की बेआवाज़ चीख़ को क़ानून की ज़ुबान देना है। सवाल बस एक है कि क्या यह उम्मीद की पहली किरण है, या फिर असमानता पर लगाया गया नया मेकअप?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को छह साल हो चुके हैं। बड़े-बड़े वादे किए गए। समावेशी शिक्षा, डिजिटल क्रांति, 5+3+3+4 का चमत्कार। काग़ज़ पर प्रगति दिखती है, लेकिन ज़मीन पर नहीं। 2025 तक नई संरचना सिर्फ़ 67 फीसदी स्कूलों में लागू हो पाई है। प्राथमिक स्तर पर नामांकन ऊंचा है, मगर माध्यमिक आते-आते बच्चे ग़ायब होने लगते हैं। दाख़िला सबका है, लेकिन सीख, सम्मान और मौके अब भी चंद लोगों की जागीर बने हुए हैं। यह सुधार नहीं बल्कि पुरानी असमानता का नया संस्करण है।
सरकारी और निजी स्कूलों की खाई हर साल गहरी हो रही है। ग्रामीण भारत में ज़्यादातर स्कूल सिर्फ़ प्राथमिक तक सीमित हैं। शिक्षक कम, सुविधाएं नदारद। कई जगह पानी और शौचालय भी ‘लक्ज़री’ हैं। इसके उलट, निजी स्कूल “ग्लोबल सिटीजन” गढ़ने का दावा करते हैं, एसी, स्मार्ट क्लास, करियर काउंसलर, एक्टिविटीज़। माता-पिता मजबूरी में निजी स्कूलों की ओर भागते हैं, इच्छा से नहीं, डर से। सरकारी स्कूलों से भागना आज “पसंद” नहीं, “सर्वाइवल” बन चुका है।
भाषा इस अपार्थीड की सबसे ऊंची दीवार है। नीति मातृभाषा की बात करती है, मगर बाज़ार अंग्रेज़ी की इबादत। नौकरी, इंटरव्यू, प्रमोशन, हर जगह “पॉलिश्ड इंग्लिश” पासपोर्ट है। सोच, समझ और मेहनत पीछे छूट जाती हैं। नतीजा यह है कि लाखों बच्चे भाषा के डर से स्कूल छोड़ देते हैं। लड़कियों के लिए यह दीवार और ऊंची है; साक्षरता के आंकड़े आज भी इस ज़ख़्म की गवाही देते हैं।
फिर आता है कोचिंग का साम्राज्य, शिक्षा का एक समानांतर काला बाज़ार। जो पैसे दे सकता है, वही “मेधावी” कहलाता है। कोटा से लेकर ऑनलाइन ऐप्स तक, सपना बिकता है, दबाव मुफ़्त में मिलता है। आत्महत्याओं की डरावनी ख़बरें बताती हैं कि यहां हुनर नहीं बल्कि सहनशक्ति और जेब की मोटाई परख़ी जाती है। ग़रीब का टैलेंट फेल नहीं होता, उसे मैदान में उतरने ही नहीं दिया जाता है।
कोविड के बाद डिजिटल शिक्षा को बराबरी का औज़ार बताया गया था। हक़ीक़त इसके उलट निकली। शहर ऑनलाइन हो गए, गांव ऑफ़लाइन रह गए। न स्मार्टफोन, न नेटवर्क, न बिजली। बच्चे छतों पर चढ़कर सिग्नल ढूंढते रहे। “बफरिंग” सिर्फ़ वीडियो की नहीं, ज़िंदगी की हालत बन गई। डिजिटल डिवाइड ने गरीब बच्चे को और पीछे धकेल दिया।
डिग्रियां बढ़ रही हैं, मगर काबिलियत नहीं। कॉलेज और यूनिवर्सिटी डिग्री बांट रहे हैं, रोज़गार नहीं। पढ़ा-लिखा युवा सबसे ज़्यादा बेरोज़गार, सबसे ज़्यादा नाराज़ है। पेपर लीक, भर्तियों में घोटाले, सड़कों पर प्रदर्शन—यह गुस्सा नहीं, टूटे भरोसे की आवाज़ है।
आज शिक्षा आज़ादी का औज़ार नहीं रही, वह तक़दीर छांटने की मशीन बन चुकी है। जन्म तय करता है स्कूल, स्कूल तय करता है भविष्य। जब तक शिक्षा पर ख़र्च बढ़ेगा नहीं, सरकारी स्कूल सम्मान वापस नहीं पाएंगे, भाषा दीवार नहीं बल्कि पुल बनेगी, और तकनीक आख़िरी बच्चे तक पहुंचेगी, तब तक यह शैक्षणिक अपार्थीड हमारे समाज को भीतर से खोखला करता रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दे दी है। अब बारी सिस्टम की है, सुनने और बदलने की। वरना, इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा। बराबरी की कक्षा अब चाहिए, क्योंकि “बाद में” कहने की मोहलत अब खत्म हो चुकी है।






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