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टूटते स्कूल, उड़ते सपने : क्या ऐसे बनेगा भारत विश्व गुरु…!


बृज खंडेलवाल

कल्पना कीजिए एक सरकारी स्कूल की कक्षा की। ब्लैकबोर्ड आधा टूटा हुआ है। चॉक की धूल हवा में तैर रही है। छत से प्लास्टर झड़ रहा है। बच्चे फटी किताबों पर झुके बैठे हैं। और, इसी देश में हम बड़े गर्व से घोषणा करते हैं कि भारत विश्व गुरु बनने जा रहा है। सवाल सीधा है। क्या टूटे ब्लैकबोर्ड पर करोड़ों बच्चों के सपने लिखे जा सकते हैं?

भारत का शिक्षा तंत्र किसी सजे-संवरे बगीचे जैसा नहीं दिखता। यह तो एक पैबंद लगी रजाई है। कहीं रेशम का टुकड़ा, कहीं टाट का। कहीं चमकदार निजी स्कूल, कहीं जर्जर सरकारी इमारतें। देश में आज लगभग 72 शिक्षा बोर्ड हैं। हर बोर्ड अपनी ढपली, अपना राग बजा रहा है।

Read in English: Crumbling schools, Soaring dreams; Can India become ‘Vishwa Guru’?

सीबीएसई करीब 27,000 स्कूलों का नेटवर्क लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की दौड़ के लिए ग्राउंड तैयार करता है। आईसीएसई अपनी अभिजात पहचान में सिमटा रहता है। राज्य बोर्ड स्थानीय भाषा, इतिहास और राजनीति के रंग में रंगे होते हैं।

उधर एनआईओएस उन बच्चों के लिए रास्ता खोलता है जो पारंपरिक स्कूल व्यवस्था से बाहर हो गए हैं। और, फिर आते हैं आईबी और कैंब्रिज जैसे अंतर्राष्ट्रीय बोर्ड। यहां पढ़ने वाले बच्चे सीधे वैश्विक विश्वविद्यालयों की ओर उड़ान भरते हैं। नतीजा यह है कि भारतीय शिक्षा की गाड़ी कई दिशाओं में खिंच रही है।

कोई बोर्ड बच्चों को जेईई और नीट की दौड़ में धकेलता है। कोई क्षेत्रीय इतिहास की मोटी किताबों में उलझा देता है। हर साल यह अराजकता का मेला लगता है। और उसके बीच लाखों बच्चे रास्ता खोजते रहते हैं।

अब जरा स्कूलों के भीतर झांकिए। एक तरफ महानगरों के चमचमाते निजी स्कूल हैं। कांच की दीवारें। एसी कमरे। स्मार्ट बोर्ड। रोबोटिक्स लैब। दस साल के बच्चे कोडिंग सीख रहे हैं। वे सिलिकॉन वैली और ऑक्सफोर्ड के सपने देखते हैं। दूसरी तरफ सरकारी स्कूल हैं। बरसात आते ही छत टपकने लगती है। फर्श कीचड़ से भर जाता है। कई जगह शौचालय तक नहीं हैं।

डिजिटल इंडिया की चर्चा खूब होती है। लेकिन, कई गांवों में इंटरनेट का नाम सुनते ही बच्चे ऐसे देखते हैं जैसे किसी ने परियों की कहानी सुना दी हो। यहीं से असली तस्वीर सामने आती है।

एनुअल स्टेटस ऑफ ऐजूकेशन रिपोर्ट, भारत की स्कूली शिक्षा का सबसे ईमानदार आईना है। इसे हर साल शिक्षा संस्था प्रथम जारी करती है। इसके सर्वेक्षक गांव-गांव जाकर बच्चों की पढ़ने और गणित की बुनियादी क्षमता की जांच करते हैं।

रिपोर्ट बार-बार चेतावनी देती है कि बड़ी कक्षाओं तक पहुंचने के बाद भी लाखों बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ ठीक से नहीं पढ़ पाते। साधारण घटाव जैसे गणित में भी अटक जाते हैं। यानी स्कूल में साल गुजरते हैं, पर सीखने की बुनियाद कमजोर रहती है। यहीं से असमानता की असली कहानी शुरू होती है।

अमीर परिवारों के बच्चे अंतर्राष्ट्रीय बोर्डों से पढ़कर विदेशों की उड़ान भरते हैं। गरीब परिवारों के बच्चे अक्सर बीच रास्ते में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। जन्म ही किस्मत तय कर देता है।

हम अंतरिक्ष मिशनों और डिजिटल तकनीक पर अरबों रुपये खर्च करते हैं। लेकिन, हजारों स्कूलों में आज भी शिक्षक नहीं हैं। कई कक्षाएं खाली गूंजती रहती हैं। भाषा और क्षेत्रीय राजनीति ने भी शिक्षा को अखाड़ा बना दिया है।

इस बीच, रटने की संस्कृति ने रचनात्मकता का गला घोंट दिया है। बचपन से बच्चों को सिखाया जाता है, याद करो। परीक्षा में उगल दो। फिर भूल जाओ। ज्ञान का दीपक जलाने के बजाय शिक्षा कई बार टूटे कंगनों की तरह बिखर जाती है।

एक और बड़ी समस्या है, माइग्रेशन। मान लीजिए किसी परिवार की नौकरी दूसरे राज्य में लग गई। अब बच्चे को नया बोर्ड, नई किताबें, नई परीक्षा प्रणाली झेलनी पड़ती है। माता-पिता इक्विवेलेंस सर्टिफिकेट के लिए दफ्तरों के चक्कर काटते हैं।

प्रतियोगी परीक्षाओं में भी असमानता दिखती है। जेईई और नीट की तैयारी में सीबीएसई के छात्रों को अक्सर बढ़त मिलती है। दूसरे बोर्डों के बच्चे कई बार खुद को पीछे पाते हैं। विडंबना यहीं खत्म नहीं होती है।

एक ओर देशभर में हजारों मदरसे धार्मिक शिक्षा देते हैं। आस्था का संसार फल-फूल रहा है। लेकिन, कई जगह विज्ञान और गणित पीछे रह जाते हैं। दूसरी ओर मिशनरी स्कूल आधुनिक शिक्षा देते हैं। मगर वे भी राजनीतिक बहसों के घेरे में आ जाते हैं। इन सबके बीच नई शिक्षा नीति 2020 आई। उम्मीदों का नया सूरज लेकर।

पांच प्लस तीन प्लस तीन प्लस चार का नया ढांचा। परख नाम की राष्ट्रीय मूल्यांकन प्रणाली। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या का सपना। लेकिन नीति बनाना आसान है, जमीन पर उतारना उतना ही मुश्किल है। पांच साल गुजर चुके हैं। कई राज्य अभी भी पुराने ढांचे में ही अटके हुए हैं। स्वायत्तता और राजनीति के कारण बदलाव की रफ्तार धीमी है।

आंकड़े भी देश की कहानी कहते हैं। केरल में साक्षरता लगभग 90 प्रतिशत से ऊपर चमकती है। बिहार अभी भी आधी दूरी पर हांफता दिखाई देता है। निजी स्कूलों में अंग्रेजी और विज्ञान की पकड़ मजबूत है। सरकारी स्कूलों में कई बच्चे अभी भी बुनियादी पढ़ाई से जूझ रहे हैं।

हम गगनचुंबी इमारतों का सपना देख रहे हैं। लेकिन नींव रेत की है। कहीं लड़कियां पानी भरने के लिए स्कूल छोड़ देती हैं। कहीं लड़के मवेशी चराने लगते हैं। और उसी देश के शहरों में दस साल के बच्चे मोबाइल ऐप बना रहे हैं। फासला गंगा जितना चौड़ा हो चुका है।

हमारा शिक्षा तंत्र कई बार किसी जर्जर रेलगाड़ी जैसा लगता है। डिब्बे अलग-अलग पटरी पर खिंच रहे हैं। कोई इंजन एक दिशा में नहीं। यात्रियों के सपने स्टेशन पर ही गिर जाते हैं।

यह वही देश है जो दुनिया को बड़े-बड़े सीईओ देता है। और उसी समय लाखों बच्चे बुनियादी पढ़ाई के लिए संघर्ष कर रहे हैं। टूटती दीवारें हमारे सपनों का मजाक उड़ा रही हैं। बहत्तर बोर्ड भविष्य को टुकड़ों में बांट रहे हैं। असमानता नई खाइयां बना रही है।

आधे-अधूरे उपाय अब काम नहीं करेंगे। स्कूलों को मजबूत करना होगा। शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण देना होगा। शिक्षा प्रणाली को सरल और न्यायपूर्ण बनाना होगा। वरना आने वाली पीढ़ियां एक दिन पूछेंगी कि भारत ने चांद तक रॉकेट भेज दिए, लेकिन क्या वह अपने बच्चों को एक मजबूत स्कूल भी दे पाया?



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