कुछ वक्त पहले तक, भारत में महिलाओं के ज्यादातर काम अनदेखे ही रहते थे। उनके कामों का ज्यादातर हिस्सा घरों, पारिवारिक उद्यमों और अनौपचारिक भूमिकाओं तक ही सीमित था, जिनका आधिकारिक दस्तावेज़ों में शायद ही कभी ज़िक्र दिखता था। उनका योगदान तो निरंतर था, लेकिन उन्हें मिलने वाली मान्यता सीमित थी। लेकिन, अब स्थिति बदल रही है और देश के श्रम परिदृश्य को नया रूप दे रही है।
यह बदलाव आंकड़ों में भी साफ तौर पर दिखाई देता है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण से पता चलता है कि महिला श्रम बल भागीदारी में तेज़ी से वृद्धि हुई है, जो 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 40 प्रतिशत हो गई है। इस बदलाव का नेतृत्व कर रहा है ग्रामीण भारत, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि महिलाएं काम से किस प्रकार जुड़ती हैं। महिलाएं आज न केवल कभी-कभार योगदान देने वाली के रूप में, बल्कि निरंतर आर्थिक भागीदार के रूप में उभर सामने आ रही हैं। यह वृद्धि रोजगार के अवसरों के व्यापक विस्तार और श्रम बाजार में औपचारिकीकरण की ओर निरंतर प्रगति को भी दर्शाती है। लेकिन, आंकड़े तो कहानी का सिर्फ एक हिस्सा ही बयां करते हैं।
गांवों और छोटे कस्बों में महिलाएं अभूतपूर्व पैमाने पर पारंपरिक भूमिकाओं से आगे बढ़कर उद्यमिता की ओर अग्रसर हो रही हैं। महिला नेतृत्व वाले उद्यमों को सशक्त बनाने के लिए नए सिरे से शुरू किए गए नीतिगत प्रयासों से इस रफ्तार में और तेज़ी आई है। ऋण, कौशल और बाजार संपर्कों तक विस्तारित पहुंच के साथ, यह भागीदारी से आय सुरक्षा की ओर एक बदलाव का प्रतीक है, जहां महिलाएं न केवल काम कर रही हैं, बल्कि अधिक मजबूत आजीविका का निर्माण भी कर रही हैं। अदृश्य श्रम से दृश्य उद्यम की ओर यह बदलाव खामोशी के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को नया आकार दे रहा है।
उद्यमिता में यह बदलाव भारत के बढ़ती स्टार्टअप व्यवस्था में भी दिखाई देता है। स्टार्टअप इंडिया पहल के तहत, देश विश्व के तीसरे सबसे बड़े स्टार्टअप हब के रूप में उभरा है, जहां 2.2 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप 23.3 लाख से अधिक रोजगार सृजित कर रहे हैं। खास बात यह है कि, इनमें से एक लाख से अधिक स्टार्टअप में कम से कम एक महिला निदेशक हैं, जो नवाचार-संचालित क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती मौजूदगी को दर्शाती है। बेहतर वित्तपोषण, इनक्यूबेशन सहायता और अधिक अनुकूल नीतिगत वातावरण के साथ, महिलाएं तेजी से नेतृत्व की भूमिकाओं में कदम रख रही हैं, जो भारत की नई अर्थव्यवस्था में भागीदारी से उद्यमिता की ओर एक बदलाव का संकेत है।
इसके साथ ही, कौशल तक आसान पहुंच भी नए रास्ते खोल रही है। महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में उद्योगों से जुड़े कौशल से लैस किया जा रहा है। उद्योगों पर आधारित कौशल विकास पर यह बढ़ता जोर, रोजगार क्षमता में सुधार करने और अधिक स्थिर और उत्पादक आजीविका की ओर बढ़ने में मददगार साबित हो रहा है। हालांकि, भागीदारी केवल अवसरों तक पहुंच के बारे में ही नहीं है, बल्कि कार्यस्थल पर सुरक्षा और गरिमा के बारे में भी है।
हालिया श्रम सुधारों ने इस अंतर को दूर करने का प्रयास किया है। 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेकित करने से नियामक ढांचा सरल हो गया है, साथ ही संरक्षण का दायरा भी बढ़ा है। न्यूनतम मजदूरी, व्यावसायिक सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा से संबंधित प्रावधान अब कार्यबल के एक व्यापक वर्ग को कवर करने के लिए तैयार किए गए हैं, जिनमें अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्रों के लोग भी शामिल हैं।
महिलाओं के लिए, सीमित पहुंच से एक अधिक संरचित ढांचे की ओर यह एक अहम बदलाव है, जो कार्यबल में उनकी भूमिका को मान्यता देता है और सुरक्षित, न्यायसंगत और गरिमापूर्ण कार्य परिस्थितियों को बनाए रखने का प्रयास करता है।
व्यापक स्तर पर पर देखा जाए तो, भारत ने अपने सामाजिक सुरक्षा कवरेज को 2015 में करीब 19 प्रतिशत से बढ़ाकर 2025 में 64 प्रतिशत से अधिक कर दिया है, जो भविष्य निधि, बीमा और स्वास्थ्य सेवा सहित सामाजिक सुरक्षा लाभों तक पहुंच में खासी वृद्धि को दर्शाता है। यह विस्तार खास तौर पर महिलाओं के लिए बेहद ज़रुरी है, जिनके अनौपचारिक रोजगार में संलग्न होने की संभावना अधिक है।
इन प्रयासों का प्रभाव कर्मचारी राज्य बीमा योजना के तहत स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने में भी दिखाई देता है, जो भारत के सामाजिक सुरक्षा ढांचे का एक प्रमुख स्तंभ है। जम्मू-कश्मीर के बडगाम में हाल ही में उद्घाटित ईएसआई अस्पताल 50,000 से अधिक श्रमिकों और उनके परिवारों को सेवा प्रदान करेगा, जिससे चिकित्सा देखभाल तक पहुंच में सुधार होगा और श्रमिक कल्याण के व्यापक उद्देश्य को बल मिलेगा।
कुल मिलाकर जो उभरकर सामने आ रहा है, वह सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि परिवर्तन का एक व्यापक स्वरूप है। कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। वे आय सृजन गतिविधियों और स्थानीय उद्यमों में अधिकाधिक रूप से शामिल हो रही हैं। उन्हें कौशल, सामाजिक सुरक्षा और औपचारिक प्रणालियों तक पहुंच प्राप्त हो रही है। आर्थिक ढांचे में उनकी दृश्यता भी बढ़ रही है। इसके साथ ही, यह बढ़ती आर्थिक भागीदारी, प्रतिनिधित्व और नेतृत्व के व्यापक सवालों से जुड़ रही है।
जैसे-जैसे भागीदारी बढ़ रही है और व्यवस्थाएं विकसित हो रही हैं, काम को सुरक्षित, गरिमापूर्ण और समावेशी बनाने पर जोर बढ़ता जा रहा है। इस बदलते परिदृश्य में, महिलाएं न केवल कार्यबल का हिस्सा हैं, बल्कि इसके भविष्य को आकार देने में भी वे केंद्रीय भूमिका निभा रही हैं।






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