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नए लेबर कोड, सुधार का ढोंग या मजदूरों के अधिकारों पर हमला!


आगरा की एक हाउसिंग सोसायटी की सीढ़ियां चढ़ती रामवती आज कुछ ज़्यादा ही थकी हुई थी। उसके हाथों में झाड़ू-पोंछा था, लेकिन मन पर एक और बड़ा बोझ, सरकार के नए लेबर कोड का डर।

बीती रात टीवी पर एंकरों की गर्जना थी, कि यह “ऐतिहासिक सुधार” है, रोजगार बढ़ेंगे, वेतन व्यवस्था सरल होगी। ट्विटर पर फ़ायदे गिनाए जा रहे थे। लेकिन, रामवती को समझ नहीं आ रहा था कि वह किस बात पर खुश हो, ओवरटाइम की उलझी गणना पर, छुट्टियों में कटौती पर, या इस आशंका पर कि कहीं उसका रोज़गार ही इन चमचमाते ‘सुधारों’ की पहली बलि न बन जाए। उसका 22 साल का बेटा अनिल, बगैर नौकरी के परिवार पर एक बोझा बना हुआ है, पर मोहल्ले वाले कह रहे हैं अब जॉब सिक्योरिटी की गारंटी मिल गई है!

अंग्रेजी में पढ़ें : Reforms with promise, but concerns for workers remain...

रामवती अकेली नहीं है। भारत के करोड़ों असंगठित मजदूर इन नए कोड को उत्साह से नहीं, शंका और चिंता से देख रहे हैं। जिनको सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था, वही अब सबसे ज़्यादा असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

इन लेबर कोड को सरकार ने ‘सरलीकरण’ का नाम दिया है, लेकिन ज़मीन पर यह ज़्यादा एक कॉरपोरेट-फ्रेंडली ढांचा बनते बनते नजर आ रहे हैं, जहां उद्योगपतियों को अधिक लचीलापन और कम जवाबदेही का भरोसा मिला है। खासकर असंगठित मजदूर, जो पहले ही सुरक्षा और स्थायित्व से वंचित हैं, अब ठेकेदारी और गिग मॉडल की कानूनी मान्यता से और भी कमजोर पड़ेंगे।

भारत की श्रमशक्ति लगभग 64 करोड़ है, जिनमें 90–93 फीसदी यानी करीब 57–58 करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र में हैं। ये निर्माण मजदूर, घरेलू कामगार, खेतिहर श्रमिक, स्ट्रीट वेंडर, रिक्शा चालक और तेजी से बढ़ते गिग वर्कर शामिल हैं। इनमें से अधिकांश के पास न लिखित अनुबंध है, न सामाजिक सुरक्षा, न बीमा और न बीमारी के दिनों में कोई सहारा। औसत दिहाड़ी 200–300 रुपये, कोई पेड लीव नहीं, महिलाओं पर दोगुना बोझ, घर की जिम्मेदारी अलग, काम का तनाव अलग। और, इन नए कोड ने इनमें से अधिकांश को अब भी दायरे में शामिल नहीं किया है। घरेलू कामगार, जिनकी संख्या लगभग पांच करोड़ है, लगभग पूरी तरह बाहर हैं। सुरक्षा व स्वास्थ्य संबंधी नियमों में छोटे निर्माण प्रोजेक्ट को छूट दी गई है, जहां दुर्घटनाओं का खतरा सबसे ज़्यादा रहता है।

उधर, सूक्ष्म व मझोले उद्योग, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, जटिल कंप्लायंस और नए योगदानों के बोझ से परेशान हैं। सोशल सिक्योरिटी कोड के तहत गिग वर्कर फंड और ईएसआई– पीएफ में अतिरिक्त 1–2 फीसदी योगदान छोटे कारोबारियों पर दबाव बढ़ाएगा।

21 नवंबर को केंद्र सरकार ने चार लेबर कोड लागू किए। वेजेज कोड, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड, ओएसएचडब्ल्यूसी कोड। यह दावा किया गया है कि 29 पुराने कानूनों को समेट कर व्यवस्था सरल होगी। सरकार के अनुसार राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन, डिजिटल भुगतान, गिग वर्कर्स की सुरक्षा, 40 से ऊपर के मजदूरों के लिए मुफ्त हेल्थ चेकअप और महिलाओं को नाइट शिफ्ट में काम की अनुमति जैसी सुविधाएं ‘नए भारत’ का संकेत हैं। लेकिन, सुधार की कहानी जितनी सहज बताई गई, उतनी है नहीं।

सबसे बड़ी समस्या ही परिभाषाओं से शुरू होती है। “वर्कर कौन है?” इसका जवाब हर कोड में अलग है। कई मामलों में 15,000–18,000 रुपये से अधिक कमाने वाले कर्मचारियों को सुरक्षा के कई पहलुओं से बाहर कर दिया गया है। यानी सरलीकरण का दावा कर वास्तविकता में चीजें और उलझा दी गई हैं।

फिक्स्ड-टर्म कॉन्ट्रैक्ट की व्यवस्था ने कंपनियों को कर्मचारियों को किसी भी समय हटाने की लगभग खुली छूट दे दी है। स्थायी नौकरी की अवधारणा ही कमजोर हो गई है। राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन, प्रतिदिन कितना होना चाहिए, सब राज्यों में अलग अलग स्थिति है।

साल 2019 से 2025 के बीच देशभर में लेबर यूनियनों ने इन कोड के खिलाफ विरोध दर्ज किया था। इंडियन लेबर कॉन्फ्रेंस की सिफ़ारिशें भी थीं कि कई प्रावधान मजदूरों के हितों पर प्रतिकूल असर डालेंगे। बावजूद इसके, इन सुझावों को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया गया।

एआईटीयूसी, इंटक जैसी प्रमुख यूनियन इन कोड को “मजदूर विरोधी” और “अधिकारों की कटौती” बता रही हैं। जुलाई 2025 में 25 करोड़ मजदूरों की देशव्यापी हड़ताल, इसी असंतोष की झलक थी। 26 नवंबर को एक और बड़ा आंदोलन प्रस्तावित है।

अब सवाल यह है कि कहां किसे फायदा, और किसे सबसे ज़्यादा नुकसान होगा? असंगठित मजदूर, 57–58 करोड़, सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं। सुरक्षा और स्थायित्व दोनों कमजोर होने की आशंका है। उत्पादन कंपनियों को बिना सरकारी अनुमति के 300 तक कर्मचारियों को हटाने की अनुमति। बड़ी कंपनियों को राहत है। गिग वर्कर के लिए कागज़ पर सुरक्षा, लेकिन जमीनी हक़ीक़त अभी अनिश्चित है।

करीब पांच करोड़ घरेलू कामगार लगभग पूरी तरह दायरे से बाहर हैं। निर्माण क्षेत्र के तहत छोटे प्रोजेक्ट में सुरक्षा नियम ढीले हैं। आईटी सेक्टर में कुछ लचीलापन बढ़ा है। फायदा साफ दिखता है। खनन और खतरनाक उद्योगों में निरीक्षण व्यवस्था कमजोर, क्योंकि इंस्पेक्टर अब ‘फैसिलिटेटर’ बनेंगे। लघु व मध्यम उद्योगों में कागज़ पर राहत लेकिन व्यवहार में वित्तीय बोझ बढ़ता नजर आ रहा है।

कुल मिलाकर तस्वीर एकतरफ़ा है। फायदा मुख्य रूप से नियोक्ताओं और उद्योगपतियों को ही मिलेगा। जबकि, मजदूरों, खासकर असंगठित क्षेत्र, महिलाओं, प्रवासी श्रमिकों और गिग वर्कर को सीमित, अधूरी और प्रतीकात्मक सुरक्षा मिल सकती है।

ऊपर से सुधार की पॉलिश दिख रही है, लेकिन अंदर वही पुराना ढांचा बरकरार है। इन नए लेबर कोड को सुधार कहा जा रहा है, लेकिन असल में यह कॉरपोरेट हितों के अनुरूप एक नई संरचना गढ़ने का प्रयास अधिक लगता है।

पर, रामबती, अनिल, नत्थू सिंह को उम्मीद की किरण दिख रही है। लोगों को लग रहा है कि उनका सुनहरा भविष्य सुरक्षित हो गया है, क्योंकि क्षेत्र के नेता यह भरोसा दिला रहे हैं।



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