बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

हर साल भारत के लाखों घरों में एक ही सपना पलता है। उनका बच्चा डॉक्टर बने। हर साल यह सपना एक कठिन परीक्षा से गुजरता है। और हर साल उम्मीदों का पहाड़ आंकड़ों की दीवार से टकरा जाता है...

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एक खूनी लोहे का मुक्का… बस एक। और बचपन टूटकर बिखर गया। स्कूल का गलियारा था, कोई जंग का मैदान नहीं। मगर उस दिन, सन्नाटा चीखों में बदल गया। भरोसा टूटा, और मासूमियत ज़मीन पर बिखर गई।

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कल्पना नहीं, हक़ीक़त देखिए। एक ही गली के मोड़ पर दो बच्चे खड़े हैं। उम्र बराबर, सपने बराबर। फर्क बस इतना है कि एक चमचमाते प्राइवेट स्कूल से निकलता है, स्मार्ट बोर्ड की रोशनी आंखों में, एसी की ठंडक बदन में, अंग्रेज़ी की धार आत्मविश्वास में। दूसरा सरकारी स्कूल से, टपकती छत से बचता, भीड़भाड़ वाले शौचालय से जूझता, मासिक धर्म की शर्म और असुविधा को चुपचाप ढोता हुआ...

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कस्बे के छोटे से घर में सन्नाटा पसरा था। टूटी खिड़की से आती धूल जैसे घर के भीतर की बेचैनी को और गहरा कर रही थी। पिता चुपचाप अख़बार ताक रहे थे, मां बार-बार आंचल से आंखें पोंछ रही थी। जगदीश को दिल्ली भेजने का सपना, यूपीएससी की कोचिंग का ख्वाब, पैसों की दीवार से टकराकर चकनाचूर हो गया। जमा-पूंजी नाकाफ़ी थी, कर्ज़ का रास्ता डरावना। बहन की आंखों में भी टूटा हुआ भरोसा झलक रहा था। यह सिर्फ़ एक परिवार की कहानी नहीं थी। कोचिंग की महंगी फीस ने देशभर के हज़ारों घरों को अपाहिज कर दिया है, जहां सपने हैं, काबिलियत है, पर साधन नहीं...

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क्या भारतीय उच्च शिक्षा सच में ‘उच्च’ बनेगी, या फिर ठहरी हुई सोच, राजनीतिक दखल और निहित स्वार्थों की जंजीरों में जकड़ी रह जाएगी? यही असली सवाल है। बाकी सब शोर शराबा है...

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सुबह की पहली किरणें अभी आंखें मल रही होती हैं, लेकिन सुभाष की दौड़ पहले ही शुरू हो चुकी होती है। एक हाथ में कोचिंग की मोटी-मोटी किताबें लटक रही हैं, दूसरे में स्कूल का पुराना बैग लटका है, और कंधों पर तो पूरे खानदान की आशाओं का पहाड़ सवार है...

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