बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

नई इमारत तैयार है। चमचमाता बोर्ड लग गया है। रंगीन ब्रोशर छप चुके हैं। ‘एडमिशन शुरू हैं!’ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। डेटा साइंस। साइबर सिक्योरिटी। मशीन लर्निंग। रोबोटिक्स। नाम सुनकर लगता है, बस दाखिला लो और भविष्य जेब में डाल लो। मगर कई कॉलेजों के भीतर जाइए। खाली कुर्सियां आपका स्वागत करती मिलेंगी। यही भारतीय उच्च शिक्षा की सबसे बड़ी विडम्बना है...

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लोकतंत्र में जब नया खून नहीं आता है, तो पुरानी नसों में जंग लगने लगती है। वही चेहरे, वही नारे, वही वादे और वही कुर्सी की दौड़। देश की राजनीति आज कुछ ऐसी ही थकी हुई दिखाई देती है...

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साल 1964-65 में मेरे माता-पिता आगरा के सेंट पीटर्स कॉलेज की मासिक फीस सिर्फ छह से 10 रुपये भरते थे। स्कूल की यूनिफॉर्म साधारण सूती खाकी होती थी और इसके अलावा कोई छिपा हुआ खर्च नहीं था...

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आजकल भारत में पीएचडी की बड़ी धूम है। हर साल करीब 30 से 35 हजार लोग डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर रहे हैं। विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों की संख्या साढ़े तीन लाख के आसपास पहुंच चुकी है। कागज़ पर यह तस्वीर बहुत शानदार दिखती है। लेकिन, ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी सुनाती है...

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हर साल भारत के लाखों घरों में एक ही सपना पलता है। उनका बच्चा डॉक्टर बने। हर साल यह सपना एक कठिन परीक्षा से गुजरता है। और हर साल उम्मीदों का पहाड़ आंकड़ों की दीवार से टकरा जाता है...

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एक खूनी लोहे का मुक्का… बस एक। और बचपन टूटकर बिखर गया। स्कूल का गलियारा था, कोई जंग का मैदान नहीं। मगर उस दिन, सन्नाटा चीखों में बदल गया। भरोसा टूटा, और मासूमियत ज़मीन पर बिखर गई।

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