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स्कूलों की दहलीज़ पर जमा खून, ज़मीन पर बिखरी मासूमियत


बृज खंडेलवाल

एक खूनी लोहे का मुक्का… बस एक। और बचपन टूटकर बिखर गया। स्कूल का गलियारा था, कोई जंग का मैदान नहीं। मगर उस दिन, सन्नाटा चीखों में बदल गया। भरोसा टूटा, और मासूमियत ज़मीन पर बिखर गई।

हम स्कूलों को सुरक्षित शेल्टर समझते हैं। तहज़ीब और तालीम का घर। मगर बीते 25 अप्रैल को आगरा के शास्त्रीपुरम स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल में जो हुआ, उसने इस  कल्पना को चूर-चूर कर दिया। हिंसा ने दरवाज़ा नहीं खटखटाया, वह अंदर आई, और बेरहमी से वार किया।

15 साल का एक लड़का। जबड़ा टूट गया। तीन दांत गिर गए। और जो सबसे ज्यादा ख़ौफ़नाक है; हमले में कथित तौर पर मेटल नकल्स का इस्तेमाल हुआ। ये कोई अचानक भड़की हुई झड़प नहीं थी। ये सोचा-समझा हमला था। हथियार चुना गया, साथ लाया गया, और इस्तेमाल किया गया। सवाल उठता है; क्या यह सिर्फ एक हादसा है? या फिर एक खतरनाक रुझान का इशारा?

हर बार की तरह, मामला अब फाइलों में दौड़ेगा। किशोर न्याय बोर्ड, सीसीटीवी फुटेज, जांच कमेटियां, सिस्टम अपनी रफ्तार से चलेगा। मगर आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2017 से 2022 के बीच कानून से टकराने वाले किशोरों की कुल संख्या घटी है। सुनने में राहत मिलती है। लेकिन असल हकीकत कहीं ज्यादा स्याह है। इन मामलों में हिंसक अपराधों का हिस्सा लगभग दोगुना हो गया है—2016 में 32.5 फीसदी से बढ़कर 2022 में 49.5 फीसदी।मतलब साफ है। अपराधी बच्चे कम हो रहे हैं, मगर जो हैं, वे ज्यादा खतरनाक हो गए हैं।

साल 2025 तक ऐसे मामलों की संख्या 17,000 के पार जाने का अंदेशा है। अब ये छोटी-मोटी शरारत नहीं रही। अब बात कत्ल, हथियारों से हमले और गंभीर जख्मों तक पहुंच चुकी है। यह सिलसिला न इत्तेफाक  है, न ही कोई अपवाद । देशभर में क्लासरूम अब धीरे-धीरे संघर्ष के मैदान जैसे लगने लगे हैं। 

कर्नाटक, मार्च 2026: 15 साल का छात्र, हॉस्टल में हमला। एक की मौत, कई घायल।

सूरत: क्लास 9 के छात्र को मामूली विवाद में चाकू मार दिया गया।

जमशेदपुर: 13 साल का बच्चा हथियार के साथ पकड़ा गया। वोट देने की उम्र नहीं, मगर हथियार उठाने का जज़्बा  पैदा हो चुका था।

दिल्ली: 18 साल का लड़का देशी पिस्तौल लेकर स्कूल पहुंचा, “बुलीज़ को डराने” के लिए।

भुवनेश्वर से लेकर उत्तराखंड तक, तस्वीर एक सी है। उम्र घट रही है, हिंसा बढ़ रही है। और नीयत? वह और ज्यादा संगीन हो रही है।आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है? जवाब शायद उस भावनात्मक ‘खालीपन’ में छिपा है, जिसमें आज का बच्चा पल रहा है। मां-बाप व्यस्त हैं। स्कूल दबाव में हैं। और असली बातचीत गुम हो गई है। जब बच्चा अपनी बात कह नहीं पाता, तो गुस्सा अंदर ही अंदर सड़ता है। और फिर एक दिन… वह फट पड़ता है।

आगरा का वह लड़का जिसने मेटल नकल्स इस्तेमाल किए; उसने अचानक फैसला नहीं लिया। उसने पूरी तैयारी की। यह बदलाव डराता है। “बच्चे हैं, गलती हो गई” वाली बात अब पुरानी हो गई है। अब यह सोची-समझी क्रूरता है।

स्कूल अब सिर्फ पढ़ाने की जगह नहीं रह गए हैं। शिक्षक अब गुरु कम, संकट प्रबंधक ज्यादा बनते जा रहे हैं। हर दिन एक नया खतरा, एक नई फिक्र। और सिस्टम? हमेशा की तरह, रिएक्टिव। कानून हैं; जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, पॉक्सो। मगर शुरुआती हस्तक्षेप की कोई मज़बूत व्यवस्था नहीं है।

स्कूलों में काउंसलिंग? नाम मात्र। मानसिक स्वास्थ्य? एक खामोश  मुद्दा। हमें उस गुस्से को समझना होगा, जो हथियार बनने से पहले पलता है। ये जो दरारें हैं; ये एक्स-रे में नहीं दिखतीं। आगरा का वह बच्चा शायद शारीरिक रूप से ठीक हो जाएगा। जबड़ा जुड़ जाएगा, दांत लग जाएंगे। मगर अंदर जो टूटा है? उसका इलाज कौन करेगा?

जब स्कूल में डर बसने लगे, तो सीखने की जगह सिकुड़ जाती है। भरोसा उड़ जाता है। हर आवाज़ पर चौंकना, हर चेहरे में शक देखना; ये जख्म बहुत गहरे होते हैं। हमें इन घटनाओं को “अलग-अलग केस” समझना बंद करना होगा। ये एक बढ़ते हुए पैटर्न के टुकड़े हैं।

अगर हमने जड़ों को नहीं पकड़ा, हमदर्दी  की कमी, मानसिक सहारे की गैरमौजूदगी, और झगड़े सुलझाने की कला का खत्म होना; तो ये सिलसिला थमेगा नहीं। असल सवाल यह नहीं कि “ये कैसे हुआ?” असल सवाल यह है; हम कैसी दुनिया बना रहे हैं, जहां बच्चों को किताबों के बजाय हथियार उठाने की जरूरत महसूस हो रही है? क्योंकि जब स्कूल सुरक्षित नहीं रहेंगे… तो फिर बचपन कहां बचेगा?



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