लोकतंत्र में जब नया खून नहीं आता है, तो पुरानी नसों में जंग लगने लगती है। वही चेहरे, वही नारे, वही वादे और वही कुर्सी की दौड़। देश की राजनीति आज कुछ ऐसी ही थकी हुई दिखाई देती है।
इधर, एक अजीब-सी जेन-ज़ी मुहिम ने सबका ध्यान खींचा है। दावा किया जा रहा है कि “कॉकरोचों के नेतृत्व” में चल रही यह नई पीढ़ी की हलचल युवाओं की बेचैनी और बगावत का प्रतीक बन गई है। नाम भले ही मज़ाकिया हो, मगर सवाल गंभीर है। जब युवा अपनी बात कहने के लिए इतने अजीब प्रतीक खोज रहे हैं, तब हमारे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में उनके अपने लोकतांत्रिक मंच आखिर कहां हैं? जवाब साफ है कि हमने छात्र राजनीति का दरवाज़ा ही बंद कर दिया है।
अंग्रेजी में पढ़ें : Revive Student Unions, an instrument of democratic campus life...
छात्र संघ कभी विश्वविद्यालयों की जान हुआ करते थे। पढ़ाई के साथ बहस होती थी, चुनाव होते थे, भाषण होते थे, सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे। छात्र अपनी शिकायतें लेकर संगठित ढंग से प्रशासन के सामने जाते थे। नेतृत्व सीखते थे, हारना सीखते थे और जीत को संभालना भी सीखते थे।
आज हम चाहते हैं कि युवा सीधे आईएएस बनें, सीईओ बनें, वैज्ञानिक बनें और नेता भी बनें। मगर नेता बनने की नर्सरी बंद कर दी गई है। फिर हम शिकायत करते हैं कि राजनीति में अच्छे लोग क्यों नहीं आते हैं। यह तो वही बात हुई कि खेत को पानी न दो और फसल से शिकायत करो।
1960 के दशक में शिक्षा आयोग ने भी छात्र संघों को महत्वपूर्ण माना था। सोच यह थी कि संगठित छात्र गतिविधियां युवाओं में आत्म-अनुशासन, स्वशासन और नेतृत्व की भावना पैदा करती हैं। कई जगह छात्र संघ कैंटीन चलाते थे, सहकारी दुकानें संभालते थे और साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम कराते थे। मतलब साफ था। विश्वविद्यालय केवल डिग्री बांटने की फैक्टरी नहीं हैं। वे नागरिक तैयार करने की जगहें भी हैं।
भारत के इतिहास में छात्र आंदोलनों ने कई बार राजनीति की दिशा बदल दी। 1965 का तमिलनाडु का हिंदी-विरोधी आंदोलन हो या 1974 का गुजरात का नवनिर्माण आंदोलन, छात्रों ने अपनी ताकत दिखाई। मामूली-सी मेस फीस बढ़ने से शुरू हुआ गुजरात का आंदोलन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ बड़ा जनांदोलन बन गया।
बिहार में छात्र आंदोलन से जयप्रकाश नारायण की ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा उठा। उसी दौर ने देश की राजनीति को झकझोर दिया। बाद में आपातकाल और 1977 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र का नया अध्याय लिखा।
कई बड़े राष्ट्रीय नेता छात्र राजनीति की ही देन रहे हैं। अरुण जेटली ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति सीखी। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बिहार के छात्र आंदोलनों से उभरे। सीताराम येचुरी और प्रकाश करात ने जेएनयू की छात्र राजनीति में अपने कदम जमाए। ममता बनर्जी ने भी छात्र जीवन से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की।
नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह और अशोक गहलोत जैसे अनेक नेताओं ने भी युवावस्था में संगठन और सार्वजनिक जीवन का अनुभव पाया। आज सवाल यह है कि अगली पीढ़ी कहां से आएगी? व्हाट्सऐप से? इंस्टाग्राम रील से? या किसी “कॉकरोच आंदोलन” के वायरल मीम से?
युवा ऊर्जा को आप दबा सकते हैं, खत्म नहीं कर सकते। जब उसे लोकतांत्रिक रास्ता नहीं मिलता, वह किसी और रास्ते से बाहर आती है। कभी अचानक विरोध प्रदर्शन बनकर, कभी सोशल मीडिया के गुस्से में और कभी किसी अजीब प्रतीक के पीछे। खाली जगह कभी खाली नहीं रहती है। लोकतंत्र में भी नहीं।
छात्र संघों को खत्म करने का एक तर्क हमेशा दिया गया कि हिंसा, गुटबाजी और बाहरी राजनीतिक दलों का दखल इनमें वाजिब मान लिया गया है। यह बात पूरी तरह गलत नहीं थी। कई छात्र संघ सचमुच राजनीति के अखाड़े बन गए। पढ़ाई पीछे छूट गई और पोस्टरबाजी आगे आ गई। कैंपस में बहस की जगह कभी-कभी लाठी और धमकी ने ले ली। मगर बीमारी के कारण मरीज को मार देना इलाज नहीं होता है। गलत छात्र राजनीति को सुधारना चाहिए था, छात्र राजनीति को दफन नहीं करना चाहिए था।
उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव बंद या सीमित किए गए। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और कई अन्य संस्थानों में निर्वाचित छात्र प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ता गया या खत्म हो गया। प्रशासन ने शांति तो पा ली, मगर छात्रों की लोकतांत्रिक आवाज भी काफी हद तक खो गई। अब हमें नई सोच के साथ छात्र संघों को वापस लाना चाहिए। पुराने ढर्रे पर नहीं। नए संविधान और साफ नियमों के साथ।
छात्र संघों का मुख्य काम चुनावी राजनीति नहीं होना चाहिए। उनका ध्यान छात्रों की असली समस्याओं पर रहे। फीस, छात्रावास, पुस्तकालय, खेल, सुरक्षा, परिवहन और कैंपस सुविधाओं के मामले प्रमुख होने चाहिए। बहस, वाद-विवाद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और खेलों को भी बढ़ावा दिया जाए।
हर चुने हुए छात्र प्रतिनिधि को नेतृत्व का प्रशिक्षण मिले। उसे बातचीत करना, बजट बनाना, विवाद सुलझाना और अलग राय रखने वालों को साथ लेकर चलना सिखाया जाए। चुनाव लड़ना आसान है, लोकतांत्रिक ढंग से काम करना मुश्किल है। यही हुनर सीखना जरूरी है।
विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र प्रतिनिधियों की नियमित बैठकें हों। शिकायत सड़क पर पहुंचने से पहले बातचीत की मेज तक पहुंचे। अध्यापक मार्गदर्शन करें, मगर छात्रों की आवाज दबाएं नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीति में नए लोगों की आमद का कोई विकल्प नहीं है। लोकतंत्र को हर पीढ़ी अपना नया नेतृत्व देती है। यदि युवाओं को कॉलेज में बोलने, बहस करने, हारने, जीतने और जिम्मेदारी लेने का मौका नहीं मिलेगा, तो राजनीति बूढ़ी होती जाएगी।
आज जेन-ज़ी अपनी भाषा खुद बना रही है। कभी मीम, कभी हैशटैग, कभी अजीबोगरीब प्रतीक और कभी ‘कॉकरोच’ जैसा नाम। हमें इस पर केवल हंसना नहीं चाहिए। इसके पीछे छिपी बेचैनी को समझना चाहिए। युवा कहना चाहते हैं कि उन्हें सुना जाए। कॉलेज और विश्वविद्यालय इस आवाज के लिए सबसे स्वाभाविक जगहें हैं।
राजनीति को नया खून चाहिए। उसे किसी प्रयोगशाला से नहीं लाया जा सकता है। वह कैंपस की बहसों, छात्र सभाओं, चुनावों और आंदोलनों से ही निकलेगा। छात्र संघ लोकतंत्र की वह पाठशाला हैं, जहां भविष्य के नेता पहली बार जनता का सामना करते हैं।
परीक्षा पास करने से नौकरी मिल सकती है। मगर समाज चलाने के लिए जिम्मेदारी, संवाद और नेतृत्व चाहिए। इनकी कोई गाइडबुक नहीं होती है। इन्हें जीना पड़ता है।
छात्र संघों को फिर से जीवित कीजिए। उन्हें अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ चलाइए। बाहरी दलों की कठपुतली बनने से बचाइए। मगर युवाओं का लोकतांत्रिक मंच मत छीनिए।

बृज खंडेलवाल





Related Items
ज्ञान की तलाश या सिर्फ नाम के आगे 'डॉ' लगाने की दौड़...!
शहर को कचरामुक्त बनाने में सबसे आगे हैं ठाणे के छात्र
जेईई (मुख्य) परीक्षा में इस बार नवोदय विद्यालयों के छात्र चमके