बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

चॉक की सफेद धूल से लेकर चैटजीपीटी की डिजिटल चमक तक—शिक्षा का सफर किसी जादू से कम नहीं है। कभी ब्लैकबोर्ड पर उकेरे अक्षरों में सपने संवरे, आज स्मार्टबोर्ड और एआई की दुनिया में वही सपने नए पंख पा रहे हैं...

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उत्तर प्रदेश में तकनीकी शिक्षा की तस्वीर लंबे समय से चिंताजनक रही है। राज्य के पॉलिटेक्निक और इंजीनियरिंग कॉलेजों में आधुनिक प्रयोगशालाओं व उपकरणों की कमी और कमजोर प्रशिक्षण स्तर के कारण डिग्री-डिप्लोमा धारक युवा उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप कौशल हासिल नहीं कर पाते हैं।

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भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था विराट तो है, पर इसकी नींव कमजोर है। शिक्षा के लिए सकल घरेलू उत्पाद का मात्र तीन फीसदी हिस्सा आवंटित होने से विश्वविद्यालय संसाधनों की कमी और भीड़भाड़ से जूझ रहे हैं...

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तमाम रिपोर्ट बार-बार चीख-चीख कर कह रही है कि आठवीं क्लास के बच्चे तीसरी की किताब भी नहीं पढ़ पाते। सरकारी स्कूलों में शिक्षक तो हैं, पर पढ़ाने की लगन नहीं। निजी स्कूलों में फीस है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का घोर अभाव। पाठ्यक्रम रटंत विद्या को बढ़ावा देते हैं, सोचने-समझने की क्षमता को कुचलते हैं...

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जैसे दवा की दुकान पर प्रशिक्षित फार्मासिस्ट रखना अनिवार्य है, ठीक वैसे ही ठेकेदारों को भी ट्रेंड सिविल इंजीनियर्स रखना अनिवार्य किया जाए ताकि निर्माण कौशल और गुणवत्ता में सुधार हो।

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जब से यूनिवर्सिटी कैंपस शांत और बेजान हुए हैं, देश की राजनीति को नए युवा नेतृत्व का सूखा पड़ गया है। छात्र संघ चुनाव या तो बंद हो चुके हैं या महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं। लखनऊ, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना, गोरखपुर जैसे पारंपरिक विचार-केंद्रों के विश्वविद्यालयों में अब बहसों की गूंज नहीं सुनाई देती। दिल्ली यूनिवर्सिटी का जोश ठंडा पड़ा है, और जेएनयू अपनी विचारधारात्मक लड़ाई हार चुका है। वामपंथ बूढ़ा होकर इतिहास के पन्नों में सिमट रहा है, जबकि लोहियावादी नकली समाजवादियों के पिछलग्गू बन गए हैं। संपूर्ण क्रांति के नायक अब मोह-माया के गलियारों में भटक रहे हैं। 

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