बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

यूजीसी ने विश्वविद्यालयों में कुलपति और शिक्षकों को लेकर सुधारों की एक साहसिक पहल की है। जिन लोगों को डिग्री धारकों को नौकरी देनी है, यदि उनकी भी शिक्षा व्यवस्था में कुछ दखल हो तो हर्ज क्या है। पांच वर्षों से नई शिक्षा नीति पूर्णतया लागू नहीं हो पा रही है। उच्च शिक्षा की बदहाली जग जाहिर है। आगरा विश्वविद्यालय को ही देख लें, कितना परिवर्तन हुआ है...?

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मौका मिलने पर, अधिकांश भारतीय विदेश में बसना पसंद करेंगे। चाहे वतन की मोहब्बत हो या सांस्कृतिक रिश्तों की पाबंदी, ये भावनाएं उन्हें रोक नहीं पातीं। आइए, इस मसले को गहराई से समझें...। 

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कम साधनों से चाय या पकौड़े का स्टॉल या सब्जी की ठेल लगाकर स्वाभिमान से गुजर बसर करने वाले का सम्मान होना चाहिए, और अवैध तरीके से गैर-मुल्क में कुलीगिरी करने के असफल प्रयास के बाद अपराधियों की तरह वापस लौटने वालों का सामाजिक बहिष्कार होना ही चाहिए।

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भारत एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय बदलाव के कगार पर खड़ा है। साल 2050 तक बुजुर्गों की आबादी कुल जनसंख्या की 30 फीसदी से अधिक हो जाएगी। यह प्रवृत्ति बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और बढ़ती जीवन प्रत्याशा का परिणाम है...

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क्या आगरा के डॉ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय को बचाने के लिए कुछ किया जा सकता है? यह महत्वपूर्ण प्रश्न तब और भी गंभीर हो जाता है जब उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा गिरावट के निम्न बिंदु पर पहुंचती दिखती हो, जबकि राज्य के शिक्षा मंत्री ताज नगरी से आते हों...

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"रटकर सीखने से कोई फ़ायदा नहीं होता।" शिक्षकों से अक्सर सुनी जाने वाली इस उक्ति ने एक बहस को जन्म दिया है कि क्या बेहतर है - भारत की रटकर सीखने वाली शिक्षा प्रणाली या पश्चिमी मॉडल जो रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच पर ज़ोर देता है?

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