सुबह की पहली किरणें अभी आंखें मल रही होती हैं, लेकिन सुभाष की दौड़ पहले ही शुरू हो चुकी होती है। एक हाथ में कोचिंग की मोटी-मोटी किताबें लटक रही हैं, दूसरे में स्कूल का पुराना बैग लटका है, और कंधों पर तो पूरे खानदान की आशाओं का पहाड़ सवार है...
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