Latest News: राष्ट्रीय रक्षा अकादमी एवं नौसेना अकादमी परीक्षा (II), 2025 के अंतिम परिणाम घोषित * सिविल सेवा परीक्षा, 2025 के अंतिम परिणाम घोषित * राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईएफटी) ने ऑनलाइन आवेदन पत्र भरने की अंतिम तिथि 13 जनवरी तक बढ़ाई

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On a rain-soaked morning in Mawsynram, Meghalaya, Banshailang Marbaniang stood watching dark clouds roll across the hills. The rain fell steadily, as it often does in the world's wettest place. Yet it was not the weather that occupied his thoughts; it was the question that had followed him for years: how does a young man from one of the remotest corners of the country build a future when opportunities are as scarce as the rain is abundant...

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मेघालय के मॉसिनराम में बारिश से भीगी एक सुबह, बंशैलंग मारबानियांग पहाड़ियों पर छाए काले बादलों को देख रहे थे। बारिश लगातार हो रही थी, जैसा कि दुनिया की सबसे ज़्यादा बारिश वाली इस जगह पर अक्सर होता है। फिर भी, उनके दिमाग में मौसम नहीं, बल्कि एक ऐसा सवाल चल रहा था, जो बरसों से उनके साथ था। वह यह कि देश के सबसे दूर-दराज़ इलाकों में से एक में रहने वाला कोई युवा अपना भविष्य कैसे बनाए, जब वहां मौके उतने ही कम हों, जितनी ज़्यादा वहां बारिश होती है...

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हर साल भारत के लाखों घरों में एक ही सपना पलता है। उनका बच्चा डॉक्टर बने। हर साल यह सपना एक कठिन परीक्षा से गुजरता है। और हर साल उम्मीदों का पहाड़ आंकड़ों की दीवार से टकरा जाता है...

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प्राइवेट कॉरपोरेट की एंट्री, ऑनलाइन, ओपन स्कूल, 72 बोर्ड, दर्जनों भाषाएं, अनगिनत सुझाव, लेकिन प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का आधुनिकरण और लोकतांत्रिकरण, आज़ादी के बाद से अब तक नहीं हो पाया है, नई शिक्षा नीति लागू होने के बावजूद। क्यों?

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कल्पना नहीं, हक़ीक़त देखिए। एक ही गली के मोड़ पर दो बच्चे खड़े हैं। उम्र बराबर, सपने बराबर। फर्क बस इतना है कि एक चमचमाते प्राइवेट स्कूल से निकलता है, स्मार्ट बोर्ड की रोशनी आंखों में, एसी की ठंडक बदन में, अंग्रेज़ी की धार आत्मविश्वास में। दूसरा सरकारी स्कूल से, टपकती छत से बचता, भीड़भाड़ वाले शौचालय से जूझता, मासिक धर्म की शर्म और असुविधा को चुपचाप ढोता हुआ...

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The Supreme Court’s latest directives on basic educational facilities deserve a loud welcome. At least someone in authority has acknowledged what millions of parents and students already know: our classrooms are not equal, and pretending otherwise is cruel self-deception.

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