बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

जैसे दवा की दुकान पर प्रशिक्षित फार्मासिस्ट रखना अनिवार्य है, ठीक वैसे ही ठेकेदारों को भी ट्रेंड सिविल इंजीनियर्स रखना अनिवार्य किया जाए ताकि निर्माण कौशल और गुणवत्ता में सुधार हो।

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जब से यूनिवर्सिटी कैंपस शांत और बेजान हुए हैं, देश की राजनीति को नए युवा नेतृत्व का सूखा पड़ गया है। छात्र संघ चुनाव या तो बंद हो चुके हैं या महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं। लखनऊ, वाराणसी, इलाहाबाद, पटना, गोरखपुर जैसे पारंपरिक विचार-केंद्रों के विश्वविद्यालयों में अब बहसों की गूंज नहीं सुनाई देती। दिल्ली यूनिवर्सिटी का जोश ठंडा पड़ा है, और जेएनयू अपनी विचारधारात्मक लड़ाई हार चुका है। वामपंथ बूढ़ा होकर इतिहास के पन्नों में सिमट रहा है, जबकि लोहियावादी नकली समाजवादियों के पिछलग्गू बन गए हैं। संपूर्ण क्रांति के नायक अब मोह-माया के गलियारों में भटक रहे हैं। 

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पिछले माह केंद्रीय स्वास्थ मंत्री जेपी नड्डा ने राज्य सभा में आशा वालंटियर्स के महत्वपूर्ण योगदान को सराहते हुए वायदा किया था कि उनका मंत्रालय वेतन सुधार की मांगों पर विचार करेगा और ज्यादा सहूलियतें मुहैया कराएगा...

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ग्रामीण भारत के एक ढहते हुए सरकारी स्कूल में कदम रखें, फिर एक चमचमाते निजी संस्थान की दहलीज पार करें, असमानता वज्रपात की तरह आपको कौंधा देगी। एक बच्चा, मोटा है, लाड़-प्यार में पलता है तो दूसरा, खोखली आंखों वाला, मुफ़्त मिड डे मील के लिए कटोरा थामे खड़ा है...

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"जिन दिनों हम सेंट पीटर्स में पढ़ते थे, हम पांच भाई जो अलग-अलग कक्षाओं में थे, एक ही किताब से पढ़ लेते थे, वर्षों ‘रेडिएंट रीडर’, ‘रेन की ग्रामर’, इतिहास और भूगोल आदि विषयों की किताबें बदली नहीं गईं। हॉस्पिटल रोड पर ‘सेकंड-हैंड’ किताबें मिल जाती थीं। यूनिफॉर्म भी बस एक, खाकी, जूते भी एक जोड़ी, काले, जिन्हें रोजाना पॉलिश करके चमकाना होता था। अब तो बस हर साल का यही रोना, धंधे के चक्कर में सब कुछ बदल गया है," यह वेदना थी 1950 के दशक के पढ़े ‘ताऊजी’ प्रेम नाथ की।

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भारतीय तकनीकी स्नातकों को विश्व पटल पर छा जाने का एक जबर्दस्त मौका दिया है। अंग्रेजी जानने वाले विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित के स्नातक दुनिया में सबसे ज्यादा हर वर्ष हमारे देश से निकलते हैं। जरूरत गुणवत्ता सुधारने की है। 2024 में पूरे विश्व में दो लाख 77 हजार पीएचडी अवॉर्ड हुईं, अमेरिका में 77 हजार, चीन में 56 हजार, और भारत में सिर्फ 23 हजार। सॉफ्टवेयर सेवाओं में भारत आज चौथे नंबर पर है। हमारे डॉक्टर विश्व के अनेक देशों की स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ की हड्डी हैं, लेकिन अपने देश में मेडिकल इंडस्ट्री ग्लोबल हब नहीं बन सकी है।

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