बृज खंडेलवाल

बृज खंडेलवाल वरिष्ठ पत्रकार हैं।

"जिन दिनों हम सेंट पीटर्स में पढ़ते थे, हम पांच भाई जो अलग-अलग कक्षाओं में थे, एक ही किताब से पढ़ लेते थे, वर्षों ‘रेडिएंट रीडर’, ‘रेन की ग्रामर’, इतिहास और भूगोल आदि विषयों की किताबें बदली नहीं गईं। हॉस्पिटल रोड पर ‘सेकंड-हैंड’ किताबें मिल जाती थीं। यूनिफॉर्म भी बस एक, खाकी, जूते भी एक जोड़ी, काले, जिन्हें रोजाना पॉलिश करके चमकाना होता था। अब तो बस हर साल का यही रोना, धंधे के चक्कर में सब कुछ बदल गया है," यह वेदना थी 1950 के दशक के पढ़े ‘ताऊजी’ प्रेम नाथ की।

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भारतीय तकनीकी स्नातकों को विश्व पटल पर छा जाने का एक जबर्दस्त मौका दिया है। अंग्रेजी जानने वाले विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित के स्नातक दुनिया में सबसे ज्यादा हर वर्ष हमारे देश से निकलते हैं। जरूरत गुणवत्ता सुधारने की है। 2024 में पूरे विश्व में दो लाख 77 हजार पीएचडी अवॉर्ड हुईं, अमेरिका में 77 हजार, चीन में 56 हजार, और भारत में सिर्फ 23 हजार। सॉफ्टवेयर सेवाओं में भारत आज चौथे नंबर पर है। हमारे डॉक्टर विश्व के अनेक देशों की स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ की हड्डी हैं, लेकिन अपने देश में मेडिकल इंडस्ट्री ग्लोबल हब नहीं बन सकी है।

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तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के पास तीन भाषा फॉर्मूले के जरिए हिंदी को लागू करने का विरोध करने के अपने राजनीतिक कारण हो सकते हैं, लेकिन वैज्ञानिक शिक्षा की बढ़ती जरूरतों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चुनौतियों का सामना करते हुए, दो भाषा फॉर्मूले पर आना एक समझदारी भरा कदम माना जाएगा।

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हाल ही में एक आईटी कंपनी ने कई प्रशिक्षुओं को नौकरी से निकाल दिया। इसके बाद काफी शोर-शराबा और विरोध प्रदर्शन हुआ। हायरिंग कंपनी के द्वारा आउटसोर्स किए गए कुछ निजी प्रशिक्षकों ने कहा कि "जिन लोगों को निकाला गया, उनमें संचार कौशल की कमी थी और महीनों की ट्रेनिंग के बावजूद उनकी भाषाई क्षमताओं में कोई सुधार नहीं हुआ।"

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यूजीसी ने विश्वविद्यालयों में कुलपति और शिक्षकों को लेकर सुधारों की एक साहसिक पहल की है। जिन लोगों को डिग्री धारकों को नौकरी देनी है, यदि उनकी भी शिक्षा व्यवस्था में कुछ दखल हो तो हर्ज क्या है। पांच वर्षों से नई शिक्षा नीति पूर्णतया लागू नहीं हो पा रही है। उच्च शिक्षा की बदहाली जग जाहिर है। आगरा विश्वविद्यालय को ही देख लें, कितना परिवर्तन हुआ है...?

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मौका मिलने पर, अधिकांश भारतीय विदेश में बसना पसंद करेंगे। चाहे वतन की मोहब्बत हो या सांस्कृतिक रिश्तों की पाबंदी, ये भावनाएं उन्हें रोक नहीं पातीं। आइए, इस मसले को गहराई से समझें...। 

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