"जिन दिनों हम सेंट पीटर्स में पढ़ते थे, हम पांच भाई जो अलग-अलग कक्षाओं में थे, एक ही किताब से पढ़ लेते थे, वर्षों ‘रेडिएंट रीडर’, ‘रेन की ग्रामर’, इतिहास और भूगोल आदि विषयों की किताबें बदली नहीं गईं। हॉस्पिटल रोड पर ‘सेकंड-हैंड’ किताबें मिल जाती थीं। यूनिफॉर्म भी बस एक, खाकी, जूते भी एक जोड़ी, काले, जिन्हें रोजाना पॉलिश करके चमकाना होता था। अब तो बस हर साल का यही रोना, धंधे के चक्कर में सब कुछ बदल गया है," यह वेदना थी 1950 के दशक के पढ़े ‘ताऊजी’ प्रेम नाथ की।
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